रजनीगंधा के फूलों में अधिकतम उत्पादन और सुरक्षा पर ध्यान देने के लिए विशेष बिंदु।

रजनीगंधा

यह अति लोकप्रिय मीठी सुगन्ध युक्‍त सफेद पुष्प डंडी दायी पौधा है। देखने में यह प्याज जैसा लगता है। इसके फूंल वर्षाकाल में तथा वर्षा समाप्ति के बाद सर्दियों तक खिलते रहते हैं। दो-तीन कलियां रोज खिलती रहती हैं| इसकी पुष्य डंडी काज़ार में पुष्प सज्जा हेतु बिकत्ती है | फूल इकहरे तथा दोहरे दोनों प्रकार के होते हैं । फूल मुख्यतः केश सज्जा, हार बनाने व मेज पर सजाने आदि के काम आते हैं | पुष्प डंडी कई दिन तक खराब नहीं होती ।

रजनीगंधा
रजनीगंधा

दिल्ली की मंडी में रजनीगंधा की भारी मांग होने के कारण इसकी व्यवसाहिक खेती की और दिल्ली के साथ लगते गुरुग्राम, फरीदाबाद व सोनीपत के किसानों का रुझान बढ़ रहा है ।

अधिक लाभ के लिए निम्न बातों की जानकारी आवश्यक है।

किस्में :- सिंगल-कलकत्ता, सिंगल रजत रेखा, स्वण रेखा।

डबल :- क्रलकत्ता ।

बिजाईं का समय :- रजनीगंधा के कंद रोपण के लिए मार्च-अप्रैल का समय उचित है।

दूरी :- 20 से 20 सै.मी. की दूरी पर 7-9 सैं.मी. की गहराई पर कंद रोपण करना चाहिए।

रजनीगंधा की बिजाई पुष्प कंदों द्वारा की जाती है। बड़े आकार के बल्ब बिजाई के लिए उपयुक्त हैं । छोटे पुथ्प कंद आकार के अनुसार फूल आने में 2-3 साल का समय लेते हैं ।

खाद कौ मात्रा :- प्रति हैक्टेयर निम्नलिखित खाद डालनी चाहिए।

तत्व शुद्ध मात्रा उवर्रक की मात्रा
गोबर की खाद 50 टन
नत्रजन200 कि.ग्रायूरिया 440 किग्रा
फास्फोरस60 कि.ग्रासुपरफास्फेट 375 कि.ग्रा.
पौटाश70 कि.ग्रा. 420 कि.ग्रा.

उत्पादन :- प्रति एकड़ 8 टन या 2 लाख पुष्प डंडियों का उत्पादन होता है।

फूल तोड़ना :- जब नीचे वाली कलियां पूरी तरह खिल जाएं तो पुष्य डंडी तोड़ लेनी चाहिए।

कंदों की खुदाई व भंडारण :- जब पत्ते सूख जाएं तो कंद कस्सी की सहायता से उखाड़ कर पत्ते हटा कर 01 प्रतिशत बावस्टीन से आघा घंटा उपचारित करके सूखे व ठण्डे स्थान पर भंडारण कर लिये जाते हैं। थोडे-थोडे दिन पश्चात्‌ कंदों को गलने सड़ने से बचाने स्थिति बदलनी चाहिए 4-5 सप्ताह के भंडारण पश्चात – पपुष्पकदों की जा सकती है ।

फूलों को बिक्री हेतु भेजना :- आम तौर पर बांस के टोकरी में रख कर फूलों को मंडी में बिक्री हेतु भेज दिया जाता है या 100 पुष्प डंडियों का बंडल बनाकर गीली अख़बार में लपेटकर डिब्बों में रखकर मंडी भेजा जा सकता है ।

शुद्ध आय :- एक एकड़ भूमि में रजनीगंधा की खेती करने से 30.000 /– रूपये की शुद्ध आय प्राप्त हो सकती है।

कीड़े व बीमारियां

थ्रिप :- यह कीट पत्तों, फूलों को नुकसान पहुंचाते हैं |

उपचार :- नुआक्रोन 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर स्प्रे करें।

माईट :- यह कीट मी पत्तों और फूलों को प्रमावित करते हैं ।

उपचार :- 0.4 प्रतिशत डाईफोलटोन (कैलथेन) का छिड़काव करें ।

कैंटर पिलर :- यह कीड़ा पुष्प डंडी को खाता है।

उपचार :- नुआन या रोगोर दवाई का छिड़काव करें।

बीमारियां :- आमतौर पर फफूंद सकलैरीशिसम के कारण पत्ते व पुष्य डंडी प्रमू होती है।

उपचार :- ब्रासीकोल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काब करें|