मूंग की बुवाई के लिए उपयुक्त समय और उन्नत खेती के लिए विशेष बिंदुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

मूंग

मूंग की फसल हर प्रकार के मौसम में उगाई जा सकती है। उत्तर भारत में इसे ग्रीष्म तथा वर्षा ऋतु में उगाते हैं। दक्षिण भारत में इसे रबी में भी उगाते हैं। ऐसे क्षेत्र, जहाँ 60-75 से0मी0 वर्षा होती है, मूंग के लिए उपयुक्त होते हैं। फली बनते तथा पकते समय वर्षा होने से दाने सड़ जाते हैं और काफी हानि होती है। उत्तरी भारत में मूंग को बसंत ऋतु (जायद) में भी उगाते हैं। अच्छे अंकुरण एवं समुचित बढ़वार हेतु क्रमशः 25 डिग्री एवं 20 से 40 डिग्री सें. तापमान उपयुक्त होता है।

मृदा (मिट्टी)

मूंग की खेती के लिए दोमट मृदा सबसे अधिक उपयुक्त होती है। इसकी खेती मटियार और बलुई दोमट मृदा में भी की जा सकती है, लेकिन उसमें उत्तम जल निकास का होना आवश्यक है।

फसल चक्र

मूंग की मिश्रित खेती बाजरा, मक्का, ज्वार, कपास और अरहर के साथ की जाती है। उत्तरी भारत में इसके साथ अपनाये जाने वाले प्रचलित फसल चक्र, मूंग-गेहूँ, मूंग-आलू, मक्का-गेहूँ-ग्रीष्मकालीन मूंग, धान-गेहूँ-ग्रीष्मकालीन मूंग आदि हैं। बहुधा ऐसा देखा गया है कि ग्रीष्मकालीन मूंग की उपज वर्षाकालीन मूंग की अपेक्षा अधिक होती है क्योंकि ग्रीष्मकालीन फसल में सिंचाई के साधन का प्रयोग होने और अधिक वर्षा न होने से पानी की मात्रा संतुलित होती है। साथ ही इस मौसम में कीटों तथा रोगों का प्रकोप भी उतना उग्र नहीं होता है।

उन्नत किस्में

पकने में लगने वाले समय के आधार पर मूंग की किस्मों को अगेती, मध्यम एवं पछेती किस्मों में विभाजित किया गया है। पूसा संस्थान द्वारा विकसित मूंग की प्रमुख किस्मों का उल्लेख सारणी-1 में किया गया है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों के लिए अनुमोदित मूंग की अन्य किस्में तथा उनकी विशेषताएं यहाँ पर दी जा रही हैं –

  • टाइप 44 – इसका पौधा बौना होता है। तना अर्धविस्तारी और पत्तियाँ गहरे हरे रंग की होती हैं। फूल पीले होते हैं। बीज गहरे हरे रंग के और मध्यम आकार के होते हैं। फसल पकने में 60-70 दिन का समय लेती है। यह सभी मौसमों में उगाई जा सकती है।
  • मूंग एस 8 – पौधा मध्यम ऊँचाई का और सीधे बढ़ने वाला होता है। तना विस्तारी होता है, फूल हल्के पीले रंग के होते हैं। फलियाँ 6-8 सें.मी., लम्बी, चिकनी व काली होती हैं। एक फली में 10-12 तक हरे चमकदार बीज पाए जाते हैं। फसल तैयार होने में 75-80 दिन लेती है। इसमें पीले मोजैक रोग का प्रकोप कम होता है। यह खरीफ ऋतु में उगाई जा सकती है।

    सारणी – 1 पूसा संस्थान द्वारा विकसित मूंग की प्रमुख किस्में
    क. ग्रीष्म मौसम में बुवाई
किस्मअनुमोदित वर्षअनुमोदित क्षेत्र/ परिस्थितिउपज (क्विं/है.)विशेषताएँ
पूसा विशाल2001उत्तर पश्चिमी मैदानी क्षेत्र (पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, राजस्थान, जम्मू कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश का मैदानी क्षेत्र)/बसंत/ ग्रीष्म मौसम में बुवाई के लिए12यह किस्म विषाणु जनित पीली चित्ती रोग की प्रतिरोधी है। यह किस्म एक साथ पकने वाली है, जो बसन्त के मौसम में 65-70 दिनों में और ग्रीष्म में 60-65 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है।
पूसा रत्ना2005राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली/खरीफ मौसम में बुवाई के लिए12यह किस्म एक साथ पकने वाली है, जो 65-70 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। यह किस्म विषाणु जनित पीली चित्ती रोग की सहिष्णु है।
पूसा 0672अप्रैल 2009 में चिन्हित की गईउत्तरी पहाड़ी क्षेत्र/खरीफ मौसम में बुवाई के लिए9.5-10यह किस्म मूंग के विषाणु जनित पीली चित्ती रोग व अन्य रोगों की सहिष्णु है। इसका दाना चमकदार हरा, आकर्षक एवं मध्यम आकार का है।
पूसा 06722010उत्तर के पहाड़ी क्षेत्र में खरीफ के मौसम की बुवाई के लिए9.5-10मुख्य बीमारियाँ जैसे एम वाई एम वी (मूंग पीत मोजेक विषाणु) व सी एल एस के लिए सहनशील, दाने चमकीले हरे आकर्षक एवं मध्यम आकार (3.8-5.3 ग्राम प्रति 100 दाने) के पकने की अवधि 52 से 103 दिन

ख. खरीफ मौसम में बुवाई

पूसा 95312001पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, जम्मू कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश का मैदानी क्षेत्र12यह किस्म 60-65 दिनों में पक कर तैयार हो जाती तथा विषाणु जनित पीली चित्ती रोग एवं कीटों की सहिष्णु है।
  • मूंग जवाहर 45 – इसका पौधा लम्बा व सीधा होता है तथा पत्तियाँ हरी होती हैं। फूल पीले तथा बीज चमकदार व हरे रंग के होते हैं। फसल पकने में 80 दिन का समय लेती है। यह खरीफ के लिए उपयुक्त है।
  • पी एस 46 – पौधे की लम्बाई 45 से.मी. तक होती है तथा वह सीधा बढ़ने वाला होता है। पत्तियाँ पीलापन लिए हुए हरे रंग की होती हैं। फूल पीले तथा बीज चमकदार हरे रंग के होते हैं। फसल तैयार होने में 60-70 दिन का समय लगता है। यह खरीफ तथा ग्रीष्म, दोनों ऋतुओं के लिए ठीक है।
  • पी एस 10 (कांति) – इसका पौधा भी सीधा होता है। फूल पीले बड़े आकार के धुंधले आकार के होते हैं। फसल 75 दिन में तैयार होती है। इस किस्म की फलियाँ एक साथ पकती हैं, जिसके फलस्वरूप इसकी कटाई एक साथ की जा सकती है। यह खरीफ के लिए उपयुक्त है।
  • मूंग पूसा बैसाखी – यह किस्म टाइप 44 के चयन से निकाली गई है। इसका पौधा बौना तथा झाड़ीनुमा होता है। पत्तियाँ हरी होती हैं तथा तने में हल्के गुलाबी रंग के धब्बे होते हैं। फूल भूरा रंग लिए हुए क्रीमी रंग के तथा बीज हरे रंग के मध्यम आकार के होते हैं। पौधे पर प्रकाश की अवधि का प्रभाव नहीं पड़ता। फसल 60 से 70 दिन में तैयार हो जाती है। सभी फलियाँ लगभग एक साथ पकती हैं, जिससे कटाई में सुविधा होती है। यह ग्रीष्म ऋतु के लिए अधिक उपयुक्त है।
  • पंत मूंग 1 – इसका पौधा सीधा बढ़ने वाला गहरे हरे रंग का होता है। बीज हरे रंग के मध्यम आकार के होते हैं। यह किस्म पीला मोजैक विषाणु एवं सर्कोस्पोरा पर्ण चित्ती रोग के लिए काफी हद तक प्रतिरोधी है। यह किस्म खरीफ में 70 से 75 एवं जायद में 65 से 70 दिन लेती है।
  • पंत मूंग 2 – इसका पौधा मध्यम ऊँचाई का होता है। पकने के लिए 60 से 65 दिनों की आवश्यकता पड़ती है। इसे खरीफ में उगाना चाहिए। खरीफ में यह 65 से 70 दिन लेती है। यह पीला मोजैक विषाणु रोग के लिए मध्यम प्रतिरोधी है।
  • पंत मूंग 3 – इसके पौधे सीधे बढ़ने वाले होते हैं। पकने के लिए 75-85 दिनों का समय लेती है। इसे खरीफ में उगाने से अधिक लाभ मिलता है। बीज चमकीले एवं मध्यम आकार के होते हैं। यह 65-70 दिन में पकती है। यह बहुरोग प्रतिरोधी प्रजाति है।
  • पंत मूंग 4 – इसका पौधा मध्यम ऊँचाई का होता है। यह मूंग तथा उड़द दोनों के संयोग से विकसित की गई है। बीज चमकीले हरे एवं मध्यम आकार के होते हैं। यह बहुरोग प्रतिरोधी प्रजाति है। इसके पकने की अवधि 65 से 70 दिन है। यह उत्तर-पूर्वी भारत के मैदानी क्षेत्रों में खरीफ मौसम के लिए अनुमोदित की गई है।
  • पंत मूंग 5 – यह जायद मौसम के लिए उपयुक्त है। इसके दाने चमकीले तथा बड़े आकार (1000 दानों का भार 50-55 ग्रा.) के होते हैं। फलियाँ गुच्छों में लगती है। यह उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए अनुमोदित है। इसकी औसत उपज 15-18 क्विंटल/हेक्टेअर है।
  • एस.एम.एल. (S.M.L) 668 – यह किस्म जायद मौसम के लिए अति उत्तम है क्योंकि यह 60-65 दिनों में तैयार हो जाती है। यह किस्म उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिये अनुमोदित है, जिसे पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा विकसित किया गया है।

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खेत की तैयारी

ग्रीष्मकालीन फसल को बोने के लिए गेहूँ को खेत से काट लेने के बाद केवल सिंचाई करके (बिना किसी प्रकार की खेत की तैयारी कर के) मूंग बोयी जाती है, परन्तु अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए एक बार हैरो चलाकर जुताई कर के पाटा फेर कर खेत तैयार करना ठीक रहता है।

बुवाई

वर्षा ऋतु की फसल को मध्य जुलाई से अगस्त के दूसरे सप्ताह तक बोना चाहिए। बसंतकालीन फसल फरवरी के दूसरे पखवाड़े या मार्च में बोनी चाहिए। इसी प्रकार ग्रीष्मकालीन फसल को गेहूँ काटने के तुरन्त बाद बो देना आवश्यक होता है, क्योंकि बुंवाई में एक या दो दिन की भी देरी होने से पैदावार कम हो जाती है। खरीफ की फसल को 30 से 35 सें0मी0 की दूरी पर पंक्तियों में बोना चाहिए और पौधे से पौधे की दूरी लगभग 7 से से 10 सें.मी. होनी चाहिए। किस्म के अनुसार इसके लिए 12 से 15 कि0ग्रा0 बीज प्रति हेक्टेअर लगेगा। बसन्त तथा ग्रीष्मकालीन ऋतु की फसल के पौधे की बढ़वार कम होती है। इसलिए 25-30 सें0मी0 पंक्ति से पंक्ति की दूरी पर्याप्त है। इसके लिए 20 से 25 कि0ग्रा0 बीज प्रति हेक्टेअर लगेगा। बीज को कवकनाशी रसायन जैसे थीरम या बाविस्टीन से उपचारित करके बोना चाहिए। बोने के लिए सीडड्रिल का प्रयोग किया जा सकता है।

पोषक तत्व प्रबन्धन

भारत के विभिन्न भागों में किसानों के खेतों पर किए गए परीक्षणों से यह सिद्ध हुआ है कि 15-20 कि0ग्रा0/हेक्टेअर नाइट्रोजन देने से मूंग की बढ़वार अच्छी होती है। कम उर्वरक शक्ति वाली भूमि में 40-50 कि0ग्रा0 फास्फोरस प्रति हेक्टेअर डालना भी आवश्यक हो जाता है।

जल प्रबन्धन

ग्रीष्म व बसन्त कालीन मूंग की फसल को 4 से 5 सिंचाइयाँ देना आवश्यक होता है। प्रथम सिंचाई बुवाई के 20 से 25 दिन बाद व अन्य सिंचाई 12 से 15 दिन के अन्तर पर करें। वर्षा ऋतु की फसल की आवश्यकता अनुसार सिंचाई करें। वर्षा ऋतु की मूंग में उचित जल निकास की व्यवस्था आवश्यक है।

खरपतवार प्रबन्धन

बोने के बाद 35-40 दिन के भीतर खरपतवारों की सघनता के अनुसार एक या दो निराई-गुड़ाई पर्याप्त होती है। बुवाई के तुरन्त बाद 2 कि0ग्रा0/हेक्टेअर लासो (सक्रिय तत्व) का 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर भूमि पर छिड़क देने से खरपतवारों का काफी समय के लिए नियंत्रण हो जाता है।

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कीट प्रबन्धन

  1. फफोला भृंग – यह बहुभक्षी कीट लगभग पूरे देश में मूंग की फसल को हानि पहुँचाता है। इसके वयस्क फूलों को चट कर जाते हैं और उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसका कीटनाशकों द्वारा नियंत्रण नहीं हो पाता हैं रात्रि में प्रकाश पाश का प्रयोग कर के इस कीट के प्रजनन को कम किया जा सकता है। इसके अलावा दस्ताने पहनकर कीटों को खेत में एकत्रित करें और गड्ढे में दबाकर नष्ट कर दें।
  2. सूडिया – मूंग की फसल को नुकसान पहुँचाने वाली सूंडियों में हेलिकोवर्पा और सूंडी प्रमुख हैं। हेलिकोवर्पा की सूंडी फली में छेद कर उसके अन्दर का गूदा खा जाती है और तम्बाकू की सूंडी मुख्यतः पत्तियों को बहुत तेजी से खाती है। इस कीट की निगरानी के लिए 5 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेअर लगाएं तथा आवश्यकतानुसार बी टी और एच एन पी वी का छिड़काव करें। कीटनाशक डेल्टामैथ्रिन (1 मि0ली0/ली0) का छिड़काव कीटों की संख्या को ध्यान में रखकर करें। तम्बाकू की सूंडियों (छोटी अवस्था) को और उनके अंड़ों को चुनकर नष्ट कर दें। आवश्यकता होने पर एन पी वी का छिड़काव करें

    रोग प्रबन्धन

    सर्कोस्पोरा पर्ण-चित्ती – पत्तियों पर प्रायः वृत्ताकार तथा कभी-कभी कोणीय 0.5-4 एम एम (औसत 3-4 मि.मि.) व्यास के विक्षत प्रकट होते हैं, जिसका रंग बैंगनी, लाल तथा मध्य भाग भूरा होता है। कभी-कभी रोग ग्रस्त भागों के साथ मिलने पर पत्ती की दो शिराओं के बीच अनियमित आकार का धब्बा बन जाता है। पत्ती की ऊपरी सतह पर धब्बे अधिक स्पष्ट होते हैं। अधिक धब्बे बनने के कारण फलियों का रंग काला पड़ जाता है और रोग की उग्र अवस्था में बीज भी संक्रमित हो जाते हैं। तनों पर बड़े आकार की चित्तियाँ बन जाती हैं। रोग के लक्षण दिखाई देने पर 0.05 प्रतिशत बाविस्टीन या 0.2 प्रतिशत जिनेब का छिड़काव करना चाहिए। 1000 लीटर घोल एक हेक्टेअर के लिए पर्याप्त होता है तथा इसे 7-10 दिन के अन्तर पर दोहराते हैं। कुल 3-4 छिड़कावों से रोग का अच्छा नियंत्रण होता है। खेत में पड़े अवशेषों को निकालकर जलाने से आरम्भिक निवेश द्रव्य की मात्रा कम हो जाती है।
    पीला मोजैक – पीली कुर्बरता के रूप में यह रोग मूंग की रोग ग्राही जातियों में अधिक व्यापक होता है। नयी उगती हुई पत्तियों में प्रारम्भ से ही कुर्बरता के लक्षण दिखाई देते हैं। जिन पत्तियों में पीली कुर्बरता या पीली ऊतकक्षय कर्बरता के मिले-जुले लक्षण दिखाई देते हैं, उनके आकार छोटे रह जाते हैं। ऐसे पौधों में बहुत कम व छोटी फलियाँ होती हैं। ऐसी फलियों का बीज सिकुड़ा हुआ और मोटा व छोटा होता है। यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है। इसलिए यह रोगवाहक सफेद मक्खी की रोकथाम से नियंत्रित हो सकता है। खेत में ज्यों ही रोगी पौधे दिखाई दे, यायोमेथाक्साम (एक्टारा) या इमिडाक्लोप्रिड (कन्फीडोर) 0.02 प्रतिशत या मेटासिस्टाॅक्स 0.1 प्रतिशत का छिड़काव कर दें। छिड़काव को 15-20 दिन के अन्तर पर दोहरायें और कुल 3-4 छिड़काव करें। छिड़काव के 24 घण्टे के बाद रोगी पौधे को उखाड़ कर जला देना चाहिए। प्रति हेक्टेअर 1000 लीटर में बना घोल पर्याप्त होता है। पीला मोजैक रोग ग्रीष्मकालीन तथा बसन्तकालीन फसल में कम तथा वर्षा ऋतु में ज्यादा लगता है। बीज उपचार कीटनाशी रसायन क्रुजर या गऊचो 4 ग्रा0 प्रति कि0ग्रा0 की दर से करें।
    मोजैक – रोग का लक्षण अनियमित हल्के हरे क्षेत्र के रूप में पत्तियों पर प्रकट होता है। पत्तियाँ विरूपित होकर आकार में छोटी हो जाती हैं और किनारे की ओर मुँह मोड़ लेती हैं। इस रोग की रोकथाम के निम्न उपाय किये जा सकते हैं –
    (1) रोगी पौधे से प्राप्त बीज को काम में नहीं लाना चाहिए।
    (2) ज्यों ही रोग के लक्षण दिखाई दे, रोगी पौधे को उखाड़ कर जला देना चाहिए।
    (3) खेती की सफाई हेतु खरपतवार निकालते रहें तथा कीटों का नियंत्रण करना चाहिए।

    कटाई एवं गहाई

    वर्षा ऋतु में जब पौधों की अधिकतर फलियाँ पक कर काली हो जाती हैं, तो फसल काटी जा सकती है। ग्रीष्म तथा बसन्तकालीन फसलों में जब 50 प्रतिशत फलियाँ पक जाएँ, तो फलियों की पहली तुड़ाई कर लेनी चाहिए। इसके बाद दूसरी बार फलियों के पकने पर कटाई की जा सकती है। फलियों को खेत में सूखी अवस्था में अधिक समय तक छोड़ने से वे चटक जाती हैं और दाने बिखर जाते हैं, जिससे उपज की हानि होती है। फलियों से बीज को समय पर निकाल दें।

    उपज

    वर्षा ऋतु की फसल से प्रति हेक्टेअर 10 क्विंटल पैदावार मिल जाती है। ग्रीष्मकालीन फसल में समुचित प्रबन्ध द्वारा 10 से 15 क्विंटल तक पैदावार लेना सम्भव है। साथ ही लगभग 15-20 क्विंटल सूखा चारा भी प्राप्त हो जाता है।