वैज्ञानिक तरीके से करे ज्वार की खेती!

ज्वार

ज्वार गर्म जलवायु की फसल है। ज्वार की खेती समुद्रतल से लगभग 1500 मीटर तक की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है। ज्वार के अंकुरण के लिए न्यूनतम तापमान 90-100 से.ग्रे. उपयुक्त होता है। पौधों की बढ़वार के लिए सर्वोत्तम औसत तापमान 260-300 से0ग्रे0 पाया गया है। फसल में बालियाँ निकलते समय 300 से.ग्रे. से अधिक तापमान फसल के लिए हानिकारक होता है। ज्वार की फसल कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है, क्योंकि इसमें सूखे की दशा को सहन करने की अधिक क्षमता होती है। लगभग 600-1000 मि.मी. वाार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र ज्वार की खेती के लिए सबसे अनुकूल होते हैं।

मृदा (मिट्टी)

ज्वार की खेती देश के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मृदाओं में की जाती है, परन्तु अच्छे जल निकास वाली चिकनी दोमट या दोमट मृदा, जिसका पी.एच. मान 6.0-8.5 के बीच हो, इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम होती है। मध्य भारत की कपास की काली मृदा ज्वार की खेती के लिए बहुत उपयुक्त समझी जाती है। ज्वार की फसल हल्की लवणीय या क्षारीय मृदा में भी आसानी से उगाई जा सकती है।

फसल-चक्र

ज्वार की फसल को दलहनी, तिलहनी तथा अन्य फसलों के साथ अन्तः/मिश्रित फसल पद्धति के रूप में उगाया जाता है। कुछ प्रमुख अन्तः/मिश्रित फसल पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं –
ज्वार, उड़द/मूंग; ज्वार, लोबिया/ग्वार; ज्वार, सोयाबीन; ज्वार, अरहर; ज्वार, तिल; ज्वार ,अरण्डी।
देश के विभिन्न क्षेत्रों में ज्वार आधारित कुछ प्रमुख फसल चक्र निम्नलिखित हैं –
उत्तरी भारत – ज्वार-गेहूँ/जौ; ज्वार-चना/मटर/मसूर; ज्वार-बरसीम; ज्वार-आलू-मूंग; ज्वार-आलू-गेहूँ; ज्वार-लाही-बसंतकालीन गन्ना।
दक्षिणी भारत – मूंगफली-ज्वार-अरहर; ज्वार-धान; ज्वार-कपास; कपास-ज्वार-चना; ज्वार-मडुआ-तम्बाकू।

उन्नत किस्में

ज्वार की नई किस्में अपेक्षाकृत बौनी हैं और उनमें अधिक उपज देने की क्षमता है। ये किस्में उपयुक्त मात्रा में खाद, उर्वरक एवं पानी के प्रयोग से अच्छी उपज देती हैं और गिरती भी नहीं हंै।़ अधिकांश नई किस्में पकने में कम समय लेती हैं। विभिन्न राज्यों के लिए अनुमोदित दाने के लिए ज्वार की उन्नतशील किस्में सारणी-1 में दी गई हैं –

खेत की तैयारी

अच्छी उपज लेने के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लें। इसके लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या हैरो से करने के बाद 2-3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करें। बोने से पहले पाटा चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए तथा बुवाई के समय खेत खरपतवार रहित होना चाहिये।

बुवाई

उत्तरी भारत में ज्वार की बुवाई का उचित समय जुलाई का प्रथम सप्ताह है। बारानी क्षेत्रों में मानसून की पहली वर्षा होने के एक सप्ताह के अन्दर ज्वार की बुवाई कर देनी चाहिये। देश के दक्षिणी राज्यों, जैसे – महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु, जहाँ ज्वार, रबी के मौसम में उगाई जाती है, बुवाई 15 सितम्बर से 15 अक्टूबर के मध्य करना अच्छा रहता है।

बीज की मात्रा, उसके आकार, अंकुरण प्रतिशत, बुवाई का तरीका एवं बुवाई के समय भूमि में उपस्थित नमी की मात्रा पर निर्भर करती है। साधारणतः एक हेक्टेअर क्षेत्रफल की बुवाई के लिए 12-15 कि0ग्रा. बीज की आवश्यकता पड़ती है। बुवाई से पूर्व बीज को किसी कवकनाशी रसायन जैसे एग्रोसन जी.एन. या कैप्टान आदि से 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से अवश्य उपचारित कर लेना चाहिये। इसके अतिरिक्त बीज को जैविक खाद एजोस्पीरीलम व पीएसबी से भी उपचारित करने से 15-20 प्रतिशत अधिक उत्पादन लिया जा सकता है। संकर ज्वार की बुवाई के लिए प्रत्येक वर्ष नया बीज ही प्रयोग में लाना चाहिये।

ज्वार की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए एक हेक्टेअर में पौधों की कुल संख्या लगभग 1,50,000 होनी चाहिये। इतने पौधे प्राप्त करने के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से.मी. तथा पंक्ति के अन्दर पौधे से पौधे की दूरी 15 से.मी. रखी जाए। पंक्ति में बुवाई देशी हल के पीछे कूंडों में या सीड ड्रिल द्वारा की जा सकती है। सीड ड्रिल द्वारा बुवाई करना सर्वोत्तम रहता है, क्योंकि इससे बीज समान दूरी पर और समान गहराई पर पड़ता है।
पोषक तत्व प्रबन्धन

यदि जैविक खाद, जैसे गोबर की खाद, कम्पोस्ट आदि उपलब्ध हों, तो 10 टन प्रति हेक्टेअर की दर से बुवाई के 15-20 दिन पूर्व खेत में समान रूप से बिखेर कर भूमि में अच्छी तरह मिला देना चाहिये। जैविक खादों के प्रयोग से भूमि की भौतिक दशा में सुधार होता है तथा भूमि की जलधारण क्षमता भी बढ़ती है। सिंचित दशा में ज्वार की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 100-200 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50-60 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस तथा 40-50 कि0ग्रा0 पोटाश प्रति हेक्टेअर की आवश्यकता पड़ती है, जबकि असिंचित (बारानी) दशा में 50-60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 30-40 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस, 30-40 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेअर पर्याप्त होता है।

सिंचित दशा में नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फाॅस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय फर्टी-सीड-ड्रिल द्वारा भूमि में डालें यदि फर्टी-सीड-ड्रिल उपलब्ध न हो तो उर्वरकों का मिश्रण बनाकर खेत में समान रूप से छिड़कें तथा हैरो या कल्टीवेटर चलाकर भूमि में अच्छी तरह मिला दें। नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के 30-35 दिन बाद खड़ी फसल में छिड़क दें। असिंचित (बारानी) दशा में 2 प्रतिशत यूरिया का 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करना अत्यन्त लाभप्रद पाया गया है।

मुख्य पोषक तत्वों के अतिरिक्त यदि भूमि में सूक्ष्म तत्वों की कमी हो, तो सूक्ष्म तत्वों का छिड़काव करना भी आवश्यक होता है, अन्यथा ज्वार की उपज पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। सूक्ष्म पोषक तत्वों में आयरन तथा जिंक ज्वार के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इन तत्वों की कमी पूरा करने के लिए जिंक का 0.2 प्रतिशत तथा आरयन का 0.15 प्रतिशत घोल का पर्णीय छिड़काव बुवाई के 35-40 दिन बाद करना चाहिये।

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जल प्रबन्धन

सामान्यतः ज्वार की खेती असिंचित क्षेत्रों में की जाती है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो, वहाँ पर खरीफ ऋतु में वर्षा न होने की दशा में सिंचाई कर देनी चाहिये। ज्वार की फसल में पौधों की वृद्धि, फूल तथा दाना बनते समय पानी की अधिक आवश्यकता पड़ती है। अतः इन अवस्थाओं पर सिंचाई करना आवश्यक होता है। ज्वार की फसल के लिए सिंचाई देने की चार क्रान्तिक अवस्थाएं हैं – प्रारम्भिक बीज पौधे की अवस्था, बालियाँ निकलने से पहले, बालियों के निकलते समय तथा बालियों में दाना बनने की अवस्थायें।

उपरोक्त अवस्थाओं में पानी का अभाव होने पर ज्वार की वृद्धि एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सिंचाई के साथ-साथ ज्वार की फसल में उचित जल निकास की भी आवश्यकता होती है। ज्वार की फसल में यदि देर तक पानी खड़ा रहे तो फसल को नुकसान पहुंचता है, इसलिए अतिरिक्त जल को खेत से तुरन्त निकाल देना चाहिए।

खरपतवार प्रबन्धन

ज्वार की अच्छी उपज लेने के लिए निराई-गुड़ाई करना अति आवश्यक है। निराई-गुड़ाई करने से खरपतवार नियंत्रण के साथ-साथ भूमि में वायु का संचार होता है तथा भूमि में नमी भी सुरक्षित रहती है। बुवाई के लगभग 3 सप्ताह बाद बैल चालित ब्लेड हैरो या हस्त चालित व्हील से एक निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए। यदि किसी कारणवश निराई-गुड़ाई सम्भव न हो, तो बुवाई के तुरन्त बाद ‘एट्राॅजिन’ नामक खरपतवारनाशी की 0.75-1.0 कि0ग्रा0 मात्रा का 700-800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेअर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

कीट प्रबन्धन

ज्वार की फसल को कीटों द्वारा अत्यधिक हानि होती है, अतः अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए सही समय पर इनकी रोकथाम करना आवश्यक है। ज्वार की फसल को नुकसान पहुँचाने वाले मुख्य कीट और उनका नियंत्रण इस प्रकार है –

(क). तना छेदक – इसकी गिडार अथवा सूड़ियाँ छोटे पौधों की गोभ को काट देती है, जिससे गोभ सूख जाती है। इसका प्रभाव बुवाई के 15 दिन बाद से आरम्भ होकर फसल में भुट्टे आने के समय तक होता है। पौधे की बढ़वार के साथ ही ये तने में सुरंग सी बना लेती है और अन्दर ही अन्दर तने के मुलायम हिस्सों को खाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप पौधे के वृद्धि भाग की मृत्यु हो जाती है, जिसे ‘डैड-हर्ट’ के नाम से जाना जाता है। इसकी रोकथाम के लिए बुवाई के 25 दिनों बाद काॅर्बोफ्युराॅन (3 प्रतिशत) दानेदार कीटनाशक 20 कि0ग्रा0 प्रति हेक्टेअर की दर से डालना चाहिए तथा 10 दिनों के बाद दूसरा बुरकाव इसी मात्रा में पौधों की गोभ में करना चाहिए।

(ख). पर्ण फुदका (पाइरिला) – इस कीट का आक्रमण बेमौसम व पेड़ी ज्वार में अधिक पाया गया है। यह कीट पौधों की पत्तियों का रस चूसकर नुकसान पहुंचाता है, जिससे पौधों का हरापन कम हो जाता है और पौध सूख जाते हैं। इस कीट का नियंत्रण सामान्यतया स्वयं ही हो जाता है। अधिक आक्रमण होने पर क्लोरपाइरोफाॅस (20 ई0सी0) कीटनाशी की 1 लीटर दवा का 600-700 लीटर पानी में घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए।

(ग). तना मक्खी – यह ज्वार का एक प्रमुख कीट है। इसका प्रकोप पौधों के जमाव के लगभग 7 दिन बाद से 30 दिन तक होता है। कीट की इल्लियाँ उगते हुए पौधों की गोभ को काट देती है, जिससे शुरू की अवस्था में ही पौधे सूख जाते हैं। कुछ पौधों की गोभ सूख जाने के बाद भी कल्ले निकलते हैं, पर उनमें भुट्टे देर से आते हैं और उनका आकार भी छोटा होता है। इसके नियंत्रण के लिए कार्बोफ्युरान 3 जी, या फोरेट 10 जी 20 कि0ग्रा0 प्रति होक्टेअर की दर से बुवाई के समय कूड़ों में डालना चाहिए। यह कीटनाशक पौधों की जड़ों द्वारा अवशोषित होकर पौधों में पहुँचता है और ऐसे पौधों को खाने के बाद गिडारें मर जाती हैं।

(घ). ज्वार का मिज़ – यह देश के दक्षिणी राज्यों – महाराष्ट्र, कर्नाटक व तमिलनाडु में ज्वार की फसल को हानि पहुँचाने वाला मुख्य कीट है। यह कीट ज्वार में भुट्टे निकलने के समय फसल को नुकसान पहुँचाता है। इसकी रोकथाम के लिए कार्बोरिल 50 डब्ल्यू0पी0, कीटनाशक का ज्वार में भुट्टे निकलते समय 8-10 दिन के अन्तराल पर दो बार छिड़काव करना चाहिए।

(ङ). ज्वार का माइट – यह बहुत ही छोटा कीट होता है, जो पत्तियों की निचली सतह पर जाले बुनकर उन्हीं के अन्दर रहकर पत्तियों से रस चूसता है। ग्रसित पत्ती लाल रंग की हो जाती हैं और बाद में सूख जाती हैं। इसकी रोकथाम अन्य कीटों की रोकथाम के साथ स्वतः ही हो जाती हैं।

(च). बालदार सूंडी – यह कीट विभिन्न फसलों को नुकसान पहुँचाता है। इस कीट के शरीर पर घने बाल होने के कारण इस कीट को बालदार सूंड़ी कहा जाता है। इस कीट की छोटी-छोटी सूंड़ी पौधे की मुलायम पत्तियों को खा जाती है, जिससे पौधे की पत्तियों पर केवल शिरायें ही शेष बचती हैं। इस कीट के नियंत्रण के लिए क्लोरपाइरोफास (20 ई0सी0) का 0.1 प्रतिशत घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए।

(छ). माहू (एफिड) – इस कीट के शिशु एवं वयस्क पौधें का रस चूसते रहते हैं, जिससे पौधों की पत्तियों के किनारे पर पीली-नीली धारियाँ दिखाई पड़ती हैं। इस कीट के प्रकोप से तरल द्रव बनने लगता है, जिससे फसल पर फफूंदी का आक्रमण होने लगता है और दाने की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसकी रोकथाम के लिए मेटासिस्टाॅक्स 25 ई0सी0 की एक लीटर मात्रा का प्रति हेक्टेअर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

ज्वार की फसल को भुट्टे लगने के समय से लेकर कटाई तक चिड़ियों से भी बहुत नुकसान पहुँचता है। अतः फसल को नुकसान से बचाने के लिए चिड़ियों से रखवाली करना भी बहुत आवश्यक है।

रोग प्रबन्धन

(क). दाने का कंड (स्मट) – यह ज्वार का सबसे हानिकारक कवक जनित रोग है। इसका प्रकोप पौधों में भुट्टे निकलते समय होता है। यह मुख्यतः बीज द्वारा फैलता है। इस कवक के बीजाणु अंकुरण के समय जड़ों द्वारा पौधों में प्रवेश कर जाते हैं। पौधों में भुट्टे आने पर दानों की जगह कवक के काले बीजाणु भर जाते हैं। बीजाणु बाहर से एक कड़ी झिल्लीदार परत से ढँके रहते हैं, जिसके फटने पर वे बाहर आकर फैल जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए बीज को किसी कवकनाशी दवा, जैसे-केप्टान या वीटावैक्स 2.5 ग्राम प्रति कि0ग्रा0 बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करें।

(ख). अर्गट – संकर ज्वार में इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। इस बीमारी के बीजाणु हवा द्वारा फैलते हैं तथा बीमारी का प्रकोप फसल में फूल आने के समय होता है। पुष्प शाखा पर स्थित स्पाइकिल से हल्के गुलाबी रंग का गाढ़ा व चिपचिपा शहद जैसा पदार्थ निकलता है, जो मनुष्य तथा पशुओं दोनों के लिए हानिकारक होता है। अर्गट रोग से ग्रसित भुट्टों को काटकर जला देना चाहिए। भुट्टों में दाना बनने की अवस्था पर थीरम (0.2 प्रतिशत) के 2-3 छिड़काव करके रोग के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

(ग). ज्वार का किट्ट – यह भी एक कवक जनित रोग है। इस रोग का असर पहले पौधे की निचली पत्तियों पर दिखाई पड़ता है और बाद में ऊपर की पत्तियों पर भी फैल जाता है। पत्तियों पर लाल या बैंगनी रंग के धब्बे पड़ जाते हैं और पत्तियाँ समय से पहले ही सूख जाती हैं। किट्ट रोग की रोकथाम के लिए रोगरोधी किस्में उगानी चाहिए और पौधों पर रोग के लक्षण दिखाई देने पर डाइथेन एम-45 (0.2 प्रतिशत) नामक कवकनाशी का 10 दिन के अन्तराल पर दो बार छिड़काव करना चाहिए।

(घ). जड़ विगलन – ज्वार की फसल में यह रोग कवक द्वारा फैलता है। यह बीमारी मृदा तथा बीज दोनों के द्वारा फैलती है, परन्तु मृदा द्वारा यह बीमारी मुख्य रूप से फैलती है। फसल में बीमारी के लक्षण बुवाई के 30-35 दिन बाद दिखाई देते हैं। रोग ग्रसित पौधों की बढ़वार रुक जाती है, पत्तियाँ मुड़ जाती हैं तथा पुरानी पत्तियों का ऊपरी भाग पीला पड़ जाता है। बीमारी का प्रकोप अधिक होने पर पौधों की सम्पूर्ण पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और पौधे मर जाते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए बीजों को बोने से पूर्व किसी कवकनाशी रसायन, जैसे थीरम या केप्टान 2.5 ग्राम प्रति कि0ग्रा0 बीज दर से उपचारित करना चाहिए तथा ज्वार की रोगरोधी प्रजातियाँ उगानी चाहिए।

(ङ). मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू) – रोग के लक्षण पौधों की ऊपरी नई पत्तियों पर पहले दिखाई पड़ते हैं, जिसमें पत्तियों की निचली सतह पर सफेद रंग का चूर्ण जमा हो जाता हैं रोगग्रसित पत्तियाँ पीली पड़कर झड़ जाती हैं। यदि रोग का आक्रमण फसल की प्रारम्भिक अवस्था में हो जाता है, तो पौधों की वृद्धि रुक जाती है तथा पौधों में भट्टे नहीं निकलते। इस रोग की रोकथाम के लिए रोगरोधी प्रजातियाँ उगानी चाहिए। रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए, बीज को बुवाई से पूर्व ऐपराॅन-35 एस0डी0 या रिडोमील एम0जेड0-72 से 2.58 ग्राम प्रति कि0ग्रा0 बीज दर से उपचारित करना चाहिए तथा फसल पर रिडोमिल (0.1 प्रतिशत) का छिड़काव करना चाहिए।

(च). तना-विगलन (चारकोल विगलन) – इस रोग का प्रकोप तमिलनाडु व महाराष्ट्र में रबी में उगाई जाने वाली ज्वार की फसल पर अधिक देखा गया है। यदि रोग का आक्रमण छोटी अवस्था में होता है, तो पौधा सूख जाता है। बड़े पौधों पर इसका प्रभाव होने पर भुट्टे छोटे रह जाते हैं तथा समय से पहले ही पक जाते है, तना कमजोर और खोखला हो जाता है और अक्सर पौधे गिर जाते हैं। तने के निचले भाग के पिथ में कवक के काले रंग की बढ़वार दिखाई देती है, क्योंकि यह रोग मृदा द्वारा फैलता है। अतः इसके प्रभावी नियंत्रण के लिए फसल चक्र व अन्तः फसलीकरण प्रणाली अपनानी चाहिए और फसल में नाइट्रोजन का कम प्रयोग करना चाहिए तथा भूमि में नमी संरक्षण की विधियाँ अपनानी चाहिए।

कटाई

ज्वार की विभिन्न किस्में 100-130 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। फसल पकने पर भुट्टे के हरे दाने सफेद या पीले रंग में बदल जाते हैं। भुट्टो में दानों के अन्दर जब नमी घटकर 20 प्रतिशत तक रह जाए, तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। संकर ज्वार में फसल पकने तक पौधे हरे बने रहते हैं। अतः खड़ी फसल से भुट्टों की कटाई हँसिया या दराँती से कर के, फसल को सुखाकर कड़वी (सूखे चारे) के रूप में अथवा हरी अवस्था में पशुओं के लिए चारे के रूप में उपयोग कर लेना चाहिए।

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मड़ाई

कटाई के पश्चात् ज्वार के भुट्टों को खलिहान में कम से कम एक सप्ताह तक सूखने देना चाहिए। भुट्टों की मड़ाई डण्डों से पीटकर, बैलों द्वारा दाँय चलाकर या थे्रशर द्वारा कर लेते हैं। मड़ाई के तुरन्त बाद ओसाई कर के दानों को भूसे से अलग कर लिया जाता है। ध्यान रहे कि इस समय दाने में 20 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं होनी चाहिए। अन्यथा मड़ाई अच्छी नहीं होती है।

उपज

ज्वार की खेती यदि उन्नत सस्य विधियाँ अपनाकर की जाए, तो संकर ज्वार से सिंचित दशा में औसतन 35-40 क्विंटल दाने तथा 100-200 क्विंटल कड़वी और असिंचित (बारानी) क्षेत्रों में 20-25 क्विंटल दाने तथा 70-80 क्विंटल कड़वी प्रति हेक्टेअर प्राप्त हो जाती है।

सारणी 1: दाने के लिए ज्वार की उन्नत किस्में

राज्यखरीफ ज्वारखरीफ ज्वाररबी ज्वाररबी ज्वार
संकरसंकुलसंकरसंकुल
महाराष्ट्रसी एस एच 14,
सी एस एच 9,
सी एस एच 16,
सी एस एच 18
सी एस वी 13,
सी एस वी 15,
एस पी वी 699
सी एस एच 13 आर,
सी एस एच 15 आर
सी एस वी 83,
सी एस वी 143, एस पी वी 21 आर स्वाति,
एम 35-1
कर्नाटकसी एस एच 14,
सी एस एच 17,
सी एस एच 16 सी एस एच 13,
सी एस एच 18
एस वी 1066,
डी एस वी 1,
डी एस वी 2,
सी एस वी 10,
सी एस वी 11, सी एस वी 15
सी एस एच 13 आर,
सी एस एच 15 आर,
सी एस एच 19 आर
एन टी जे 3,
सी एस वी 8 आर,
एम 35-1,
डी एस वी 5,
सी एस वी 21 आर
आन्ध्र प्रदेशसी एस एच 14,
सी एस एच 13,
सी एस एच 16, सी एस एच 18, सी एस एच 9, सी एस एच 1
सी एस वी 10,
सी एस वी 11,
सी एस वी 15,
एस पी वी 462, मोती
सी एस एच 13 आर,
सी एस एच 15 आर, सी एस एच 12, आर, सी एस एच 19 आर
सी एस वी 14 मोती, एन टी जे 2,
एम 35-1,
सी एस वी 216 आर
मध्य प्रदेशसी एस एच 11, सी एस एच 13, सी एस एच 16, सी एस एच 17, सी एस एच 18सी एस वी 15, एस पी वी 235, जे जे 741, जे जे 938, जे जे 1041
गुजरातसी एस एच 9, सी एस एच 13, सी एस एच 16, सी एस एच 17, सी एस एच 18सी एस वी 13, सी एस वी 15, जी जे 35, जी जे 38, जी जे 40, जी जे 39, जी जे 41सी एस एच 8 आर, सी एस एच 12 आर, सी एस एच 15 आर, सी एस एच 19 आरसी एस वी 14 आर, सी एस वी 8 आर, सी एस वी 216 आर
राजस्थानसी एस एच 14, सी एस एच 13, सी एस एच 16, सी एस एच 18सी एस वी 10, सी एस वी 13, सी एस वी 15, एस पी वी 96
तमिलनाडुसी एस एच 14, सी एस एच 17, सी एस एच 13, सी एस एच 16, सी एस एच 18एस पी वी 881, सी ओ 24, सी ओ 25, सी ओ 26, सी एस वी 13, सी एस वी 15, सी ओ 27, सी ओ (एस) 28सी एस एच 15 आर, सी एस एच 5, सी ओ एच 13 आर, सी ओ एच 3सी ओ 24, सी ओ 25, सी ओ 26, सी एस वी 14 आर, सी एस वी 8 आर, सी एस वी 216 आर
उत्तर प्रदेशसी एस एच 13, सी एस एच 14, सी एस एच 16, सी एस एच 18सी एस वी 10, सी एस वी 11, सी एस वी 15