ग्लैडिओलस के फूलों में अधिकतम उत्पादन और सुरक्षा पर ध्यान देने के लिए विशेष बिंदु।

ग्लैडिओलस

ग्लैडिओलस सुन्दर फ्टूलदायी शीतकालीन पुष्पकंद है। इसके फूल अपने विशेष आकर्षक रंगो के कारण अति लोकप्रिय हैं। इसके पुष्प कंद से लगभग 2 फुट लम्बी पुष्प डंडी निकलती है, जिस पर 2-8 कलियां आती हैं। प्रत्येक पुष्पडंडी पर 2-3 फूल प्रतिदिन खिलते हैं, इस प्रकार से पुष्पडंडी लगभग एक सप्ताह तक कमरे की शोभा बढ़ाती रहती है।

ग्लैडिओलस की व्यवसायिक खेती करके एक एकड़ भूमि से लगभग 80,000 /- रुपये तक वार्षिक शुद्ध आय प्राप्त की जा सकती है।

देश की राजघानी दिल्ली में फूलों की अच्छी मंडी होने के कारण साथ लगते जिलों गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत आदि में ग्लैडिओलस की व्यापारिक खेती की ओर किसानों का आकर्षण बढ़ रहा हैं। अधिक आय प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित बातें घ्यान में रखनी आवश्यक हैं।

भूमि का चुनाव

ग्लैडिओलस के कंद जल निकास युक्त उर्वरा रेतीली दोमट भूमि में लगाने चाहिए | भूमि का पी.एच. मान 6-8 अंश होना बाहिए।

किसमें

ग्लैडिओलस की निम्न किस्मों की बिजाईं लाभदायक हैः-

अमरीकनडचभारतीय
अमरीकन ब्यूटीएम्पुल ब्लोसमपुसा सुहागन
अमरीकन फ्रैंदशिप रैडफ्रैंडशिपनजराना
रैड म्जैस्टी आस्करसपना
पर्च ब्लूम वींकग्लोरीपूनम
अमरीकन सुपर व्हाईटहैपी ऐडमीरा
ग्लैडिओलस

प्रवर्धन:- ग्लैडिओलस का प्रवर्धन पुष्य कंदों (बल्बों) से किया जाता है।

कंदों की मात्रा:- एक एकड़ में 3 सै.मी. ब्यास क॑ लगभग 80.000 कंद पर्याप्त होते हैं ।

बिजाई का समय:- ग्लैडिआलरु के कंदों की बिजाई का हरियाणा राज्य में सितस्बर से नवंबर तक उपयुक्त समय है।

बिजाई की विधी :- बिजाई से पहले कंदों को 0.2 प्रतिशत कैप्टान या 0.1 प्रतिशत बैनलेट से उपचारित कर लें। कंदों को बिजाई से पहले 24 घंटे तक भिगोकर रखें। लाईन से लाईन की दूरी 30 सै भी. व पौधे की दूरी 15 सैं.मी. रखें | डोलियों पर कंद की 10 सै मी. गहराई तक बिजाई करें।

ग्लैडियोलस के फूलों की व्यवसायिक खेती के लिए 60 कंद प्रति वर्ममीटर में बिजाई की सिफारिश भी की जा रही है। कंदों की बिजाई, खुदाई के कम से कम 3 महीने बाद करें ताकि सुष्पतावस्था (डोरमैंसी) टूट सके।

खाद की मात्रा:- एक हैक्टेयर भूमि में निम्न खाद की मात्रा पर्याप्त हैं|

तत्त्वशुद्ध मात्राउर्वरक की मात्रा
नत्जन300 कि. ग्रायूरिया 660 कि.ग्रा क
फारफौरस40 कि. ग्रासिंगल सुपरफास्फेट 250 कि.ग्रा
पोटाश140 कि. ग्राप्यूरेट आफ पोटाश 65 कि या

इसके अतिरिक्त 8 – 10 गाड़ी गोबर की सड़ी खाद डालनी चाहिए। नत्रजन वाली खाद को तीन भागों में बांटकर प्रयोग करें|एक तिहाई भाग तीन पत्ते आने पर, एक तिहाई भाग 6 पत्ते आने पर एक तिहाई भाग पूरी बढ़वार होने पर|

  1. मिट्टी चढ़ाना :- जब पौधे 20-25 सैं.मी. के हो जाएं तो मिट्टी चढ़ा दें। पौधे गिरने से बचाने हेतु सहारा देना भी आवश्यक हैं|
  2. खरपतवार नियंत्रण :- आवश्यकता अनुसार 2-3 निराई गुडाई करें।
  3. सिंचाई :- पहली सिंचाई पौधों के जमाव के बाद करें। इसके पश्चात्‌ 10-15 दिन में आवश्यकता अनुसार सिंचाई करें।

फूलों की उपलब्धता :- फूल दिसम्बर से अप्रैल तक उपलब्ध होते हैं । नजदीक की मंडी में ले जाने हेतु स्पाईक पर पहली कली खिलने पर और दूर की मंडी में पहली कली खुलने पर स्पाईक काट ली जाती है। एक एकड से 70,000 स्पाईक्स मिल जाती हैं।

पैकिंग :- स्पाईक्स को काटने के पश्चात्‌ दूर की मंडियों में भेजने हेतु गत्ते के डिब्बे में और नज़दीक की मंडी में भेजने हेतु बंडल बनाकर अखबार में लपेट कर भेजना चाहिए।

कंद उखाड़कर भंडारण करना:- जब पत्ते पीले पड़ने लगें तो अन्तिम सिंचाई के एक सप्ताह बाद पत्तों समेत कंद उखाड़ कर छाया में सूखा लें | पत्ते अलग करे कंद व लघु कंद अलग-अलग करके बैविस्टीन के घोल में डूबा कर छाया में सूखा लें । कंदों को सूखी, ठण्डी, अंधेरी जगह में भंडारण कर दें ।

बीमारियां एवं उपचार

विल्ट एवं कालर रस्ट :- पत्ते पीले हो जाते हैं तथा कालर क्षेत्र में लाल भूरे रंग के घब्बे आ जाते हैं।

उपचार :- कैप्टान 0.3 प्रतिशत घोल से ड्रैचिंग कर दें ।

नैक राट यह बीमारी खेत में खड़े पौधों पर व भण्डार में पड़े कंदों पर आती है। पत्ते ऊपर से नीचे की ओर पीले होकर सड़ जाते हैं।

उपचार :- कंदों की बिजाई से पहले 2 मिनट पोटाशियम परमैग्नेट (लाल दवाई ) से उपचार करें ।

लीफरोट :- पत्ते के किनारे गहरे भूरे रंग के बड़े चकत्तों में दाग पड़ जाते हैं।

उपचार :- 0.2 प्रतिशत डायथिन एम-45 नामक दवाई का छिड़काव करें ।

नोट :- विदेशों से अच्छे किस्म के कंद (बल्ब) आयात करने वाले उत्पादकों का भारत सरकार की नीति के अनुसार राज्य के उद्यान विभाग द्वारा निशुल्क पंजीकरण किया जाता है, जिससे एक्साईज डयूटी मिलती है।