गुलदाऊदी के फूलों में अधिकतम उत्पादन और सुरक्षा पर ध्यान देने के लिए विशेष बिंदु।

गुलदाऊदी

गुलदाऊदी शीत्त ऋतु को एक अत्यन्त लोक प्रिय पृष्पीय पौधा है । इसलिए इशका शरद ऋतु की रानी भी कहा जाता है। इसमें अनेक रगों के अत्यन्त आर्कषक फूल जो विभिन्‍न आकार, माप एवं रंग के होते हैं, जोकि गमलों एवं क्यारियों में लगाने के लिए उपयुक्त होते हैं। गुलदाऊदी की एक वर्षीय और बहुवर्षीय दो प्रकार की जातियां पाई जाती है। इसकी उत्पत्ति चीन से हुईं है, परन्तु जापानियों द्वारा इसकी खेती व काश्त एवं नई जातियों का विकास किया गया है । गुलदाऊदी जापान का राष्ट्रीय पुष्प है।

भारत वर्ष में यह पौधा 19वीं शताब्दी में प्रचलित हुआ। यद्यपि गुलदाऊदी का पौधा देखने में अच्छा नहीं लगता, जबकि इसके फूल बहुत ही आकर्षक होते हैं, इन्हीं गुणों की वजह से फूल सजावट के लिए. मालाओं के लिए, वेणी एवं कंगन आदि के बनाने के लिए प्रयोग किये जाते हैं ।

वर्गीकरण

(क) उद्यान विज्ञान की दृष्टि से गुलदाऊदी को दो प्रमुख वर्गों में बांटा गया है ।

  1. एकवर्षीय गुलदाऊदी ।
  2. बहुवर्षीय गुलदाऊदी ।

1. एक वर्षीय गुलदाऊदी

यह सर्दियों में किनारियां बनाने, क्यारियों तथा गमलों में लगाने और सामूहिक प्रभाव के लिए अन्य फूलों के साथ मिलाकर लगाने के लिये उपयुक्त है। इसके फूलों का व्यास 6 से 10 सै. मी. होता है तथा इसे लगाने में कम देखरेख की आवश्यकता पडती हैं। इसकी प्रमुख जातियां क्रिसनथिमम केरिनेटस, किसनथिमम कारोनेरियम है ।इसका प्रवघन प्राय: बीजों द्वारा होता है।

2. बहुवर्षीय जातियां

गुलदाऊदी की बहुवर्षीय जातियों में अनेक रंगों के फूल पाए जाते हैं जिनमें पंखुड़ियां अनेक पंक्तियों में पाई जाती है। इनमें से कुछ प्रमुख जातिया क्रिसनथिमम मैक्सीमम, क्रि फ्रूटेसेन्स आदि है।

(ख) गुलदाऊदी की आकार के आधार पर वर्गीकरण

गुलदाऊदी को पुष्प के आकार के अनुसार दो भागों में बांटते है

(1) बड़े पुष्प वाली :- गुलदाऊदी के फूल का व्यास 10 सें.मी. से अधिक होता है।

(2) छोटी पुष्प वाली:- छोटे पुष्प वाली गुलदाऊदी के फूल का आकार 10 सें.मी. से कम होता है।

अर्न्तराष्ट्रीय मानकों के आघार प बड़े फूलों वाली गुलदाऊदी को 12 श्रेणियों तथा छोटे फूल वाली को नौ श्रेणियों में बांटा गया है:-

(ग) पुष्पन ऋतु के आघार पर:-

पुष्पन काल के आघार पर गुलदाऊदी को तीन श्रेणियों में बांटा गया है

(1) सितम्बर – अक्टूबर में फूलने वाली किस्में :-

किस्मफूल का रंग
शिनकुजीगुलाबी
शरद बहार कत्थई
शरद तारिका सफेद
शरद माला सफेद
शरद मुक्ता सफेद कत्थई

(2) नवंबर से फूलने काली किस्में :-

किस्मफूल का रंग
मेगामीगुलाबी
वमनपीला
ननाकोपीला
अप्सरासफेद गुलाबी

(3) दिसम्बर में फूलने वाली किस्में :-

किस्मफूल का रंग
पैरागान टेराकोटा
लिलीपुटपीला
इन्नोंसैन्स सफेद
मोलीटेराकोटा
सीतासफेद
रीतासफेद

(घ) उपयोगिता के आधार पर उगाईं जाने वाली प्रमुख किस्में

(1) बड़ें फलों वाली:

सफेद – ब्यूटी, वाल, विलियम टर्नर ।

पीला – चन्द्रमा, जयन्ट, इवनिंग स्टार।

बैंगनी व गुलाबी – पिक क्लाउड, क्लासिंक ब्यूटी, फिसटेल।

लाल – अल्फ्रेड सिम्सन, शर्ली मोनार्क ।

(2) छोटे फूलों वाली:-

(अ) गमलों में उगाने के लिएः-

सफेद :- मरकरी, परफेक्टा, ज्योत्सना, हनीकाम्व, शरद सोना, शरद माल।

पीला :- इक्सक्वीसिट, टोपाज, लिलीपुट, अरपना, अपराजिता, शरद शिगार ।

हल्का बैंगगी – (माव) मोडेला, मेगामी, अलीसन, चार्म ।

लाल – जम, विनीफ्रेंड, जीन, गारनेट।

(ब) कटे फूलों के व्यापार के लिए:-

सफेद – होराइजन, बीरबल सहानी, इलनी कास्केड, हिमानी, ज्योत्सना।

पीला – बेसन्ती, नानाको, सुजाता, कुन्दन, फ्रीडम ।

बैंगनी – अप्सरा, निलिमा, गैटी, अलिसन।

लाल – ब्लेज, डेन्टीमेड, जया, फलर्ट ।

(स) छोटे फूलों वाली हार के लिए सफ़ेद-बीरबल सहानी, करोल, इलनी, कास्केड, लिलिथ, शरद शोभा

पीला – बसन्ती, फ्रीडम, होसर यंजो, कुंदन, प्रो. हरिस।

प्रवर्धन

बीज द्वारा :- बीजों द्वारा गुलदाऊदी लगाने का कार्य तभी किया जाता हैं, जबकि नई किस्मों को लगाया जाना हो। बीजों को नर्सरी क्यारियों या गमलो मे बोया जाता हैं। गुलदाऊदी की एक वर्षीय किस्मों में प्रवर्धन का कार्य सदा बीज द्वारा ही किया जाता है|

सकर्स द्वारा :- फूल समाप्त होने को बाद पौँधों को अर्द्ध छाया में लगा देते हैं तथा पर्याप्त सिंचाई एवं उर्वस्क देते हैं जिससे सकर्स ज्यादा सै ज्यादा निकले । जब सकर्स 10-15 सै. मी. लम्बे हों जाये तब इन्हें अलग करके फ़रवरी-मार्च के महीने में गमले में लगा देते हैं।

शीर्ष कर्तन द्वारा :- फूल समाप्त होने के बाद पौधों को जमीन की सतह से काट दिया जाता है। नये प्ररोह पत्तियों के एक्सील एवं तने के आधार से निकलते हैँ ।शीर्ष कर्तन जो 5-8 सै. मी. लम्बा हो गांठ के ऊपर से काट देना चाहिए। कर्तन के नीचे की पत्तियोँ को हटा देना चाहिए एवं आधार भाग को सेरेडिक्स-1 नामक हार्मोन से उपचारित कर देना चाहिए उसके बाद कर्तन को भमले या क्यारियों में लगा देना चाहिए। गमले एवं क्यारियों में एक दिन में 4-5 बार पानी देना चाहिए। कर्तन लगने के 2-3 सप्ताह में उसमें जड़ें निकलती हैं और रोपण के लिए तैयार हो जाती है। सड़न से बचने के लिए कर्तन को कैप्टान नामक दवा 0.3 प्रतिशत को सिंचाई जल में मिला देना चाहिए ।

सिंचाई :- गमलों में उगाई गुलदाउदी को थोडे-थोड़े समय पर हल्की सिंचाई करनी चाहिए। वर्षा ऋतु में आवश्यकता जनुसार जाड़ों में 45 दिन में और गर्मियों में 7 दिन में एक बार सिंचाई जरूरी है गमलों तथा क्यारियों दानों में जल निकास का उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

अन्य कार्य :- खरपतवारों का पूर्ण नियन्त्रण रखना जरूरी होता हैं। क्यारियों से खरपतवारों को खुरपी तथा गमलों से हाथ से निकालना चाहिए । गमलों में उगाये पौधों को सहारे की आवश्यकता होती है जिसके लिए तीन-चार डण्डे गमलें के किनारे पर गाड देते हैं। तथा नीचे से उपर सुतली से बांध दिया जाता है जिस शाखाओं को सहारा मिला जाता है। पूर्ण खिले फूलों की कटाई देर से जब ओस की बूदें समाप्त हो जाये तब करनी चाहिए। कटाई की तुश्न्‍त बाद 5-6 किला ते के छ्विज्बमों में पैंक करता चात्तिए।

उद्यान कार्य :- गुलदाऊदी की व्ययत्तायिक खेती के लिए अच्छे जल निकाल वाली रतली मिट्टी जिसमें जैविक पदार्थ ज्यादा तथा पी. एच. 6-7 हो चुनना चाहिए। जून में भी दो तीन जुताई बहुत जरूरी हैं तथा प्रत्येक जुताई के बाद सुहागा लगाना बाहिए ताकि मिट्टी पूरी तरह भुरभुरी हो जाये, खेत की तैयारी से पहले 20 टन पूरी तरह सड़ी गोबर की खाद , 100 किलो ग्राम फ़ास्फोरस 140 किलो ग्राम पोटाश प्रति 5 एकड़ बेसल में डोज के रूप में मिला देना चाहिए। अच्छी जड़ युक्‍त कर्तन को 30 से 40 सै. मी. दूरी पर मध्य जुलाई में रोपण करना चाहिए। रोपण के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई करनी चांहिए। 30 दिन के अन्तर पर 80 किलो नत्रजन खाद दो बार में देनी चाहिएं। पौधे से पौधे की दूरी किस्म पर निर्भर करती हैं। सामान्य पंक्ति के बीच की दूरी 35 से 40 सै. मी. रखी जाती है।

पिचिंग एवं डिसबडिंग़ :- फूल अधिक संख्या में प्राप्त करने के लिए प्रारम्भिक बढ़वार के दौरान प्रमुख शाखाओं को शीर्ष पर से नोच देना लाभकारी होता है जिसका उपयुक्‍ता समय 4-7 सप्ताह होता है। इसकी शाखा से अतिरिक्‍त कलियों को निकालकर एक दो कलियों को छोड़कर फूल के आकार में सुधार लाया जा सकता है|

मुख्य रोग एवं कीट

पत्ती का काला धब्बा :- पत्तों पर गोल आकार के भूरे धब्बे बन जात हैं जो बाद में पीले पड़ कर सूख जाते हैं। जिसकी रोकथाम 0.2 प्रतिशत ज़िनेब या डाईथिन एम 45 छिड़काव से करें |

चूर्णों आसिता :- इस रोक से पत्तियों एवं तनोँ पर सफ़ेद चूर्ण जैसे ढेर दिखाई देते हैं। इसकी रोकथाम 0.5 प्रतिशत कैराथेन से की जाती है।

पुष्प सड़न :- फूल पर भूरा घब्बा बन जाता हैं जोकि बाद में पूर्ण रूप से सड़ जाता है। इसकी रोकथाम डाईथिन एम. 45 के छिड़काव से की जाती है।

मांहू :- पुष्प खिलने के समय पूरा पौधा काले रंग माहूं से ढक जाता हैं जो पौधे से रस चूसता रहता है| रोकथाम के लिए रोगर 30 ई.सी. एक मि. ग्राम एक लीटर पानी में छिड़कनी चाहिए।