उड़द की उन्नत खेती किसानों के लिए होगी फायदेमंद

उड़द

जलवायु

उड़द उच्च तापक्रम सहन करने वाली उष्ण जलवायु की फसल है। इसी कारण जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा होती है, वहाँ अनेक भागों में इसे उगाया जाता है। इसकी अच्छी वृद्धि और विकास के लिए 25-350 से.ग्रे. तापमान आवश्यक है, परन्तु यह 420 डिग्री से.गे्र. तापमान तक सहन कर लेती है। अधिक जलभराव वाले स्थानों में इसे नहीं उगाना चाहिए।

मृदा

उड़द बलुई मृदा से लेकर गहरी काली मिट्टी (पी एच मान 6.5-7.8) तक में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। उड़द का अच्छा उत्पादन लेने के लिए खेत का समतल होना और खेत से जल निकास की उचित व्यवस्था का होना अति आवश्यक है।

फसल चक्र

उड़द कम अवधि व कम बढ़वार वाली फसल होने के कारण इसे ऊँची बढ़वार वाली फसलोें के साथ उगाया जा सकत है। इसी कारण इसका अन्तःफसल प्रणाली में अच्छा स्थान माना जाता है। कुछ फसलें, जिनके साथ उड़द को उगाया जा सकता है –
अरहर + उड़द
बाजरा + उड़द
सूरजमुखी + उड़द
मक्का + उड़द
गन्ना + उड़द

ग्रीष्मकालीन उड़द को अनेक सस्यक्रम प्रणालियों में उगाया जा सकता है। ऐसे क्षेत्र, जहाँ सिंचाई की सुविधा सीमित हो, एकल फसल के रूप में उगाना उत्तम होता है। कुछ एक वर्षीय फसल चक्र, जिनके साथ उड़द को सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है, निम्नवत् हैं –

धान – गेहूँ – उड़द
आलू – गेहूँ – उड़द
अरहर – गेहूँ – उड़द
मक्का – आलू – गेहूँ – उड़द
मक्का – उड़द – गेहूँ

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उन्नत किस्में

उड़द की प्रमुख उन्नत किस्में विभिन्न प्रान्तों व क्षेत्रों के अनुसार सारणी-1 में दर्शाई गई हंै।

उन्नत किस्मेंसंस्तुत क्षेत्रउत्पादन क्षमता
(क्विंटल/हेक्टेअर)
टाइप 9 व टाइप 10उड़द उगाने वाले समस्त राज्य10-15
पन्त उड़द 30पहाड़ी क्षेत्रों के लिए, साथ ही पीला मोजैक के प्रतिरोधी10-12
बसन्त बहारउड़द उगाने वाले सभी क्षेत्रों के लिए और पीले विषाणु रोग के प्रतिरोधी10-13
उत्तरापूर्वी मैदानी व उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों के लिए तथा विषाणु रोग के प्रति अवरोधी10-15
पन्त उड़द 40उड़द उगाने वाले क्षेत्रों तथा अन्तःफसलों के साथ उगाने के लिए10-13
शेखर 2महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब10-14
नरेन्द्र उड़द 1उड़द उगाने वाले समस्त क्षेत्र10-12
पन्त उड़द 35खरीफ व जायद दोनों मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त10-14
एल वी जी 623,
एल वी जी 611
वामबान 1, वामबान 2,
वामबान 3
दक्षिणी भारत के उड़द उगाने वाले समस्त राज्यों के लिए उपयुक्त10-14

खेत की तैयारी

खेत की अच्छी तैयारी परिणामस्वरूप अच्छा अंकुरण व फसल में एक समानता के लिए बहुत जरूरी है। भारी मिट्टी की तैयारी में अधिक जुताई की आवश्यकता होती है। सामान्यतः 2-3 जुताई कर के खेत में पाटा चलाकर समतल बना लिया जाता है, तो खेत बुवाई के योग्य बन जाता है। ध्यान रहे कि जल निकास नाली की व्यवस्था अवश्य हो।

बुवाई

खरीफ की बुवाई का उचित समय मध्य जून से मध्य जुलाई तक माना जाता है। देर से बुवाई करने पर उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। गर्मी की बुवाई का उचित समय मार्च महीना माना जाता है। रबी की बुवाई का उचित समय मध्य अगस्त से मध्य सितम्बर तक अच्छा माना जाता है। इससे उपज भी अच्छी प्राप्त होती है। बुवाई के समय पंक्तियों का अंतर 30 से 45 से.मी. और पौधे से पौधे का अन्तर 5 से 10 से.मी. सही रहता है। खरीफ की बुवाई के लिए 12 से 15 कि.ग्रा./हेक्टेअर बीज पर्याप्त रहता है। गर्मी की बुवाई के लिए 20 से 25 कि.ग्रा./हेक्टेअर पर्याप्त रहता है। अधिक बीज दर रखने से पौधों की वृद्धि एवं विकास अच्छा नहीं होता है और साथ ही पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बुवाई से पूर्व बीज का उपचार राइजोबियम टीके से और पी एस वी के टीके से करें, इससे उपज में बढ़ोत्तरी होती है।

पोषक तत्व प्रबन्धन

उड़द की प्रारम्भिक अवस्था में अच्छी वृद्धि और विकास के लिए 15 से 20 कि0ग्रा0 नत्रजन/हेक्टेअर बुवाई के समय देना आवश्यक होता है। उड़द की अधिक उपज के लिए नत्रजन के साथ-साथ 40 से 50 कि0ग्रा0 फाॅस्फोरस और 30 कि0ग्रा0 पोटेशियम/हेक्टेअर का प्रयोग करें।

जल प्रबन्धन

सामान्यतः उड़द की अच्छी पैदावार लेने के लिए 4-5 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। सिंचाई क्रान्तिक अवस्था पर करें तो बहुत अच्छा रहता है। क्रान्तिक अवस्था, जैसे पुष्पावस्था व फलियों में दाना बनते समय सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। ध्यान रखें कि अधिक पानी खेत में खड़ा रहने से जड़ों की ग्रन्थियों (नत्रजनधारी) का विकास नहीं होता है और परिणामस्वरूप उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

खरपतवार प्रबन्धन

उड़द की फसल को नुकसान करने वाले खरपतवार जैसे सावा, क्रेब, घास, सांठी, मोथा, कनंकआ, जंगली जूट, मुरेल, शुतुर्मुर्ग-दुध्दी, सैंजी, लटजीरा आदि हैं। समय पर इनकी रोकथाम करना अतिआवश्यक है। इनकी रोकथाम के लिए बुवाई के 25 से 30 दिन के बाद सिंचाई करके अनुकूल अवस्था में निराई व निकाई करके नियंत्रित किया जा सकता है। आवश्यकता पड़ने पर खरपतवारनाशी रसायनों का उपयोग कर सकते हैं। खरपतवारनाशी जैसे एलाक्लोर या पेन्डिमेथालीन 1.0 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेअर का 400-500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव बुवाई के बाद एवं अंकुरण से पूर्व करना चाहिए।

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कीट प्रबन्धन

उड़द में सामान्यतः मिट्टी के झिंगुर और मूंग के डिम्भक कीट अंकुरण होते समय अधिक नुकसान करते हैं। इनकी रोकथाम की लिए फोरेट 10 प्रतिशत ग्रेन्युल रसायन की 10 कि0ग्रा0/हेक्टेअर मात्रा का बारीक मिट्टी अथवा रेत में मिलाकर खेत में बुरकाव करें, अथवा मोनोक्रोटोफाॅस रसायन की एक मि0ली0 मात्रा/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर सकते हैं।

एक अन्य कीट रोमिल गिडार फसल को काफी नुकसान करता है। इसकी रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफाॅस (1 मि.ली./ली. पानी के घोल) का छिड़काव कर सकते हैं। इनके अलावा तना मक्खी की रोकथाम के लिए कार्बोफ्युरान 25 कि0ग्रा0/हेक्टेअर को बुवाई के समय मृदा में मिला मिला देने से इसका नियंत्रण किया जा सकता है।

रोग प्रबन्धन

पीला मोजैक – इसकी रोकथाम के लिए बीज उपचार क्रुजर या गऊचो 4 ग्राम प्रति कि0ग्रा0 की दर से करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर पर्णीय छिड़काव एक्टारा या कन्फीडोर 0.02 प्रतिशत का बुवाई के 30 दिन उपरान्त करें और रोग अवरोधी किस्मों को उगायें।

पर्ण धब्बा रोग – यह पत्तियों पर धब्बे होने से पहचानी जा सकती है। इसकी रोकथाम के लिए फफूंदनाशी केप्टान अथवा जिनेब 2.5 ग्रा. दवा/लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
जड़ गलन – पौधा उखाड़ने पर जड़ों में जड़ गलन का लक्षण दिखाई देता है। इसकी रोकथाम के लिए बीज को थीरम अथवा केप्टान 2.5 ग्रा./कि.ग्रा. से बीज उपचारित करें।
एन्थे्रक्नोज – इसका प्रभाव पत्तियों एवं तने पर देखा जा सकता है। इसके अधिक प्रभाव से पैदावार में भारी कमी आ जाती है। इसकी रोकथाम के लिए थीरम 2-3 ग्रा./कि.ग्रा. की दर से बीज उपचार करें अथवा 0.2 प्रतिशत जिनेब का 10 दिन के अन्तराल पर 1-2 छिड़काव करने से इसका नियंत्रण सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
चूर्ण आसिता रोग – यह उड़द का भयंकर रोग है। अधिक प्रभाव से सफेद पाउडर पत्तियों पर आ जाता है, जो बाद में तने पर फैल जाता है, जिससे पैदावार में गिरावट आ जाती है। इसकी रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम अथवा बेनोमिल का छिड़काव करना चाहिए। इस रसायन की 2 ग्राम मात्रा/लीटर पानी में घोल बनाकर खड़ी फसल में समान रूप से छिड़काव करें।

कटाई एवं गहाई

फसल की कटाई बुवाई का समय और किस्म पर निर्भर होती है। जैसे-जैसे फलियाँ पकती जाएँ, उनकी तुड़ाई करते रहें और यदि ऐसी किस्म हैं कि फलियाँ एक साथ पक रहीं हैं, तो ऐसी स्थिति में हंसिया से कटाई करें। जब फसल पूर्ण रूप से सूख जाए, तब थे्रशर से गहाई कर सकते हैं। ध्यान रहे कि दाने में 10-12 प्रतिशत तक नमी होनी चाहिए।

उपज

अच्छी प्रकार प्रबन्धन की गई फसल से 10-15 क्विंटल प्रति हेक्टेअर तक दाने की उपज आसानी से मिल जाती है।