अरहर की बुवाई के लिए उपयुक्त समय और उन्नत खेती के लिए विशेष बिंदुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

Pigeon pea

जलवायु

अरहर आर्द्र तथा शुष्क दोनों ही प्रकार के गर्म क्षेत्रों में भली प्रकार उगाई जा सकती है, लेकिन शुष्क क्षेत्रों में इसे सिंचाई की आवश्यकता होती है। फसल की प्रारम्भिक अवस्था में पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए नम जलवायु की आवश्यकता होती है। इसे 75-100 से0मी0 वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।

मृदा (मिट्टी)

भूमि का चयन करते समय ध्यान रखना चाहिए कि खेत ऊँचा एवं समतल हो तथा उसमें जल निकास अच्छा हो। अरहर को अधिकांश मृदाओं में उगाया जा सकता है। उत्तर भारत में अरहर को बलुई दोमट मिट्टी से लेकर रेतीली दोमट मिट्टी में उगाया जाता है। अरहर की फसल के लिए बलुई-दोमट अथवा दोमट मिट्टी, जिसका पी0एच0 मान 6.5 से 7.5 के बीच हो और भूमि जल का तल गहराई पर हो, सर्वोत्तम रहती है।

फसल चक्र

अरहर की शीघ्र पकने वाली किस्में, जो 130-160 दिन में पक जाती हैं, उनके विकास होने से अरहर के बाद रबी की फसल की बुवाई सम्भव हुई है। इन किस्मों की बुवाई जून के प्रथम पखवाड़े में की जाती है और दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक फसल की कटाई कर ली जाती है। अरहर के साथ निम्नलिखित फसल चक्र अपनाए जाते हैं –
अरहर $ बाजरा/ज्वार/मक्का/तिल/सोयाबीन/उड़द/मूंग आदि
अरहर – गेहूँ
अरहर – गेहूँ – मूँग
अरहर – गन्ना
मूँग (ग्रीष्म) $ अरहर – गेहूँ
अरहर (अति अगेती) – आलू – उड़द
अरहर $ उड़द – मसूर/तारामीरा (बारानी क्षेत्रों में)

उन्नत किस्में

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान तथा विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा भारतवर्ष में उत्तरी क्षेत्रों के लिए अनेक किस्मों का विकास किया गया है, जिनकी औसत उपज लगभग 20 से 25 क्विंटल/हेक्टेअर है। उनके बारे में विस्तृत जानकारी निम्नलिखित सारणी में दी गई है –

प्रक्षेत्रकिस्मेंजारी करने का वर्षक्षेत्र की ग्रहयता
उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र
(उत्तर प्रदेश, हरियाणा,
पंजाब और उत्तरी राजस्थान)
पूसा 992 (एस.डी.)
पूसा 991
पूसा 2001
पूसा 2002
आजाद (एल.डी.)
2002
2005
2006
2008
1999
संपूर्ण क्षेत्र
संपूर्ण क्षेत्र
संपूर्ण क्षेत्र
संपूर्ण क्षेत्र
उत्तर प्रदेश, बिहार
उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (मध्य और
पूर्वी उत्तर प्रदेश,
हरियाणा, बिहार,
पश्चिम बंगाल और आसाम)
विरसा अरहर-1 (एम.डी.)
(डब्ल्यू.आर.)
पूसा-9 (एल.डी.) (प्री.रबी.) (ए.आर.)
नरेन्द्र अरहर-1 (एल.डी.) (एस.एम.आर.)
बी. 7 (श्वेता) (एल.डी.)
एम.ए.एल. 13 (एल.डी.)
1992

1993
1997

1982
2004
बिहार के पहाड़ी क्षेत्र

संपूर्ण क्षेत्र
पूर्वी उत्तर प्रदेश

पश्चिम बंगाल
संपूर्ण क्षेत्र
उत्तर-पहाड़ी क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश,
जम्मू-कश्मीर और
उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र)
आई.सी.पी.एल. 151 (जागृति) (एस.डी.)
आई.सी.पी.एल. 85010
ष्आई.सी.पी.एच. 8 (हाइब्रिड) एस.डी. वी.एल.ए.-1ष्
1989

1994

1991
संपूर्ण क्षेत्र

हिमाचल प्रदेश के मैदानी भाग
संपूर्ण क्षेत्र

एस.डी. : छोटी अवधि में पकने वाली एल.डी. लम्बी अवधि में पकने वाली
ए. आर : आल्टरनेरिया रोधी एस.एम.आर. स्टेरीलीटी मोजैक रोधी
प्री.रबी : रबी पूर्व डब्ल्यू.आर. विल्ट रोधी

खेत की तैयारी

अरहर की फसल उगाने के लिए खेत की तैयारी अच्छी होनी चाहिए। रबी की फसल की कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई कर के खुला छोड़ देना चाहिए, जिससे कि भूमि में उपस्थित कीट व उनके अण्डे सूर्य की गर्मी से मर जायें। अरहर की बुवाई से पूर्व खेत में पलेवा करना चाहिए। अरहर बोने से पहले खेत में सिंचाई करते हैं। उसके पश्चात दो या तीन दिन बाद देशी हल या कल्टीवेटर या हैरो से खेत की दो-तीन जुताई करने के बाद एक बार पाटा चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए।

बुवाई

जहाँ सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो, वहाँ जून के प्रथम सप्ताह में बुवाई करना लाभप्रद रहता है। उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्रों जैसे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके में जून के दूसरे सप्ताह में पलेवा करके अरहर की अगेती किस्मों की बुवाई करनी चाहिए। अति अगेती किस्में मानसून की पहली बरसात के बाद भी बुवाई कर सकते हैं। उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों, जैसे बिहार, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अरहर की बुवाई मानसून की पहली बरसात के बाद जून के अन्तिम सप्ताह में शुरू होती है। बीज बोने से पहले उसे जीवाणु टीका तथा फफूंदीनाशक दवा से उपचारित करें। पहले बीज को फफूंदीनाशक दवा बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति कि0ग्रा0 बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। उसके बाद ही जीवाणु टीका से उपचारित करें।

जून माह या जुलाई के प्रथम सप्ताह में बोते समय पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45-60 से0मी0 तथा पंक्ति में पौधे से पौधे की दूरी 15 से0मी0 होनी चाहिए। रबी पूर्व अरहर की बुवाई में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से0मी0 तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से0मी0 होनी चाहिए। खरीफ में जहाँ पानी खड़ा रहने की समस्या होती है, वहाँ उठी हुई क्यारियों में कंूड सिंचाई विधि द्वारा बुवाई करनी चाहिए। बीज की मात्रा 15-20 कि0ग्रा0/हेक्टेअर होनी चाहिए, जोकि बीज के आकार और बुवाई में पंक्तियों एवं पौधों की दूरी पर निर्भर करती है।

पोषक तत्व प्रबन्धन

दलहनी फसल होने के कारण अरहर के पौधे अपनी नत्रजन (नाइट्रोजन) की आवश्यकता मुख्यतः स्वयं अपनी जड़ों में पाए जाने वाली ग्रन्थिकाओं में उपस्थित जीवाणुओं द्वारा वायुमण्डलीय नत्रजन का यौगिकीकरण कर के कर लेते हैं। बलुई-दोमट या दोमट भूमियों में जहाँ नत्रजन की मात्रा कम हो, वहाँ पर प्रति हेक्टेअर करीब 20 से 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन डालना आवश्यक होता है। फाॅस्फोरस तथा पोटाश के लिए मृदा परीक्षण करना आवश्यक है। यदि भूमि में उपस्ािित फाॅस्फोरस एवं पोटाश की मात्रा कम हो, तो प्रति हेक्टेअर 80 से 100 कि0ग्रा0 फाॅस्फोरस तथा 40 से 60 कि.ग्रा. पोटाश डालना चाहिए। अरहर की अगेती किस्मों के लिए प्रति हेक्टेअर 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस और 40 कि.ग्रा. पोटाश की देनी चाहिए।

जल प्रबन्धन

जून के प्रथम सप्ताह में बुवाई की ग्रन्थी फसल को वर्षा प्रारम्भ होने से पहले दो या तीन हल्की सिंचाई देना आवश्यक होता है। यदि वर्षा का वितरण ठीक प्रकार से न हो और मौसम लम्बे समय तक सूखा रहे, तो एक सिंचाई फूल निकलने के पहले और दूसरी उसके उपरान्त फलियाँ बनते समय देनी चाहिए। अन्तिम सिंचाई फसल की कटाई के 7 दिन पहले दें और फसल काटकर अगली फसल की बुवाई के लिए खेत तैयार करें, जिसमें समय की बचत होगी और गेहूँ की फसल भी समय पर बोई जा सकेगी। खड़े पानी में अरहर की फसल को काफी नुकसान होता है, इसलिए खेत में जल निकास का समुचित प्रबन्ध होना आवश्यक है। ऐसे स्थानों पर, जहाँ पानी खड़ा रह जाता है, मेड़ों पर उगाई गई अरहर की फसल से पैदावार अधिक होती है।

खरपतवार प्रबन्धन

बुवाई से लेकर 6 दिन तक खरपतवारों की रोकथाम करना आवश्यक होता है। इसके बाद फसल की बढ़वार जोर पकड़ लेती है और खरपतवार कोई विशेष हानि नहीं पहुँचा पाते। खुरपी या कसौला के द्वारा फसल बुवाई के 30 से 45 दिन बाद दो निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। खरपतवार नियंत्रण के लिए रसायनों का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए एलाक्लोर (2 कि.ग्रा./हेक्टेअर) या पैन्डीमेथालिन (1 कि.ग्रा./हेक्टेअर की दर से) 600 लीटर पानी में घोल बनाकर बुवाई के बाद तथा उगने से पहले छिड़क दें। इसके अलावा फ्लुक्लोरेलिन 1 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेअर 600 लीटर पानी में घोल बनाकर बीज बोने से पहले छिड़काव करके भूमि की ऊपरी सतह में मिला देने से खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। अरहर में अन्तःफसलीकरण/मिश्रित खेती से भी खरपतवारों का प्रकोप कम होता है।

कीट प्रबन्धन

अरहर की फसल को अनेक प्रकार के कीटों से क्षति पहुँचती है, लेकिन मुख्य हानिकारक कीट हैं – फली बेधक, प्लूम माथ, अरहर की फली बेधक मक्खी, फली बग, गैलेरूसिड् बीटल और जैसिड इत्यादि।

फली बेधक – यह अरहर का मुख्य हानिकारक कीट है। युवा कीट पत्तियाँ खाते हैं और बाद में फली बनने पर उनमें छेद करके बीज खा जाते हैं। इस कीट से फसल को 10 से 80 प्रतिशत तक प्रतिवर्ष नुकसान हो सकता है। इसके नियंत्रण के लिए स्पाईनोसैड (3 मि.मी./10 ली.) अथवा इन्डोक्साकार्ब (1 मि.ली./ली.) का घोल छिड़कना चाहिए। पहला छिड़काव फूल आने के समय तथा दूसरा फली बनते समय करना चाहिए।

पिंच्छ की शलभ (प्लूम माथ) – यह कीट भारत के अनेक भागों, विशेषकर आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक में अरहर के उत्पादन क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी इल्ली अरहर की फलियों को काटकर या छेदकर हानि पहुँचाती है। इस कीट का नियंत्रण मोनोक्रोटोफाॅस 0.04 प्रतिशत घोल के छिड़काव से किया जा सकता है।

अरहर की फली बेधक मक्खी – उत्तरी भारत में यह कीट अरहर की फसल को काफी हानि पहुँचाता है। इस कीट के द्वारा 20 से 26 प्रतिशत तक अरहर की फसल को प्रतिवर्ष नुकसान होता है। इसके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफाॅस (0.04 प्रतिशत घोल) का छिड़काव किया जाना चाहिए।

गैलेरूसिड बीटल और जैसिड – यह कीट अरहर की पत्तियाँ खाता है, भूमि में उपस्थित होने के कारण मौसम के प्रारम्भ में ही फसल को नुकसान पहुँचाने लगता है। इन कीटों की रोकथम फसल के अन्य कीटों की रोकथाम के साथ हो जाती है। अगर फिर भी आवश्यकता हो, तो 5 प्रतिशत नीम के अर्क के घोल का छिड़काव करें।

फली बग – इस कीट के प्रौढ़ तथा नीम्फस पत्तियों, कलियों, फूलों तथा फलियों के रस को चूसते हैं, जिससे फलियाँ सिकुड़ जाती हैं और सही तरीके से नहीं बन पाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफाॅस (0.04 प्रतिशत घोल) या डाइमिथेएट (0.03 प्रतिशत घोल) का छिड़काव करना चाहिए।

मारुका – यह एक अत्यन्त हानिकारक कीट है। यह फूल, पत्ती और फली को मिलाकर एक जाल बुन लेता है तथा अन्दर बैठकर सभी कुछ चट कर जाता है। इसके बचाव के लिए बिना किसी देरी के 1 मि0ली0/ली0 की दर से इंडाॅक्साकार्ब का छिड़काव करना चाहिए।

रोग प्रबन्धन

तना विगलन – इसके रोगग्रस्त पौधे शीघ्रता से सूखकर मर जाते हैं। रोग की बढ़ी हुई अवस्था में जमीन की सतह के पास भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए रोगरोधी किस्में उगानी चाहिए। इसके साथ ही फसल ऐसे खेत में बोनी चाहिए, जिसमें पानी के निकास का अच्छा प्रबन्ध हो। बोने से पहले बीज को रिडोमील एम जेड-72 का 2.5 ग्रा0/कि0ग्रा0 द्वारा उपचारित करना चाहिए।

उक्ठा – रोगी पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और बाद में पौधा मुरझाकर सूख जाता है। अधिक वर्षों का फसल चक्र अपनाने के साथ खेतों में खरपतवार नियंत्रण बनाए रखने व गर्मी की जुताई करने से भूमि में पड़े रोगजनक नष्ट हो जाते हैं। अरहर का फसल चक्र तम्बाकू के साथ होने से बीमारी का प्रकोप कम हो जाता है। फसल के प्रभावित पौधों को कई वर्ष तक लगातार उखाड़ कर जला देने से भी रोग कम हो जाता है। इस रोग की रोकथाम का सबसे अच्छा एवं सरल उपाय रोगरोधी किस्मों का चयन किया जाना है। बिहार में एन पी 15 व एन पी 38 किस्में काफी हद तक रोगरोधी पाई गई हैं। सेलेक्शन एन पी डब्ल्यू आर 15 व सेलेक्शन-2 ई-1 में भी यह रोग कम लगता है।

सर्कोस्पोरा पर्ण चित्तियाँ – रोग की रोकथाम हो सके, उसके लिए एक ही खेत में लगातार अरहर नहीं बोनी चाहिए तथा खेत को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। इसकी रोकथाम के लिए जिनेब जैसे कवकनाशी (0.3 प्रतिशत) का 10 दिन के अन्तर पर आवश्यकतानुसार दो-तीन बार छिड़काव करना चाहिए।
बंध्यता मोजैक – इस रोग के पौधे हल्के हरे दिखाई देते हैं तथा स्वस्थ हरे पौधों से बिल्कुल भिन्न होते हैं। प्रायः रोगी पौधों की पत्तियाँ आकार में छोटी हो जाती है, जिन पर अनियमित आकार के हरे हल्के और साधारण हरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। रोगी पौधों में फूल व फली उत्पन्न नहीं होते हैं। यह रोग एक वाइरस द्वारा फैलता है। इस रोगजनक वाइरस का वाहक इरिओफिड माइट (अपृपदी) है। इस रोग के नियंत्रण के लिए खेतों में सफाई रखनी चाहिए व खरपतवार आदि उखाड़ देने चाहिए तथा जिस खेत में अरहर बोना है, यदि उसके आसपास अरहर के पुराने या अपने आप उगे पौधे हों, तो उन्हें नई फसल लगाने से पूर्व उखाड़ देना चाहिए। रोग नियंत्रण हेतु बीज को इमिडाक्लोप्रिड-70 डब्ल्यू एस. 3.0 ग्रा0/कि0ग्रा0 से उपचारित करें तथा बुवाई के 30 व 45 दिन पर कोन्फीडोर-200 एस एल (100 मि0ली0 दवा 500 लीटर पानी) का छिड़काव प्रति हेक्टेअर की दर से करना चाहिए।

कटाई व मड़ाई

अरहर की कुछ किस्में 5-6 महीने में तथा कुछ किस्में 10 महीनों में पककर तैयार होती है। अगेती किस्में नवम्बर-दिसम्बर में और पछेती किस्में मार्च-अप्रैल में काटी जाती है। फसल की कटाई परम्परागत कृषि यंत्रों/हंसिया/गंड़ासे आदि से की जाती है। फसल सूख जाने पर फलियों को काटकर या पीटकर दाने निकाले जाते हैं। यांत्रिक विधि में पूलमेन थ्रेशर का उपयोग किया जाता है।

उपज

अरहर की फसल की पैदावार उगाई गई किस्म तथा उसके प्रबन्धन पर निर्भर करती है। सिंचित क्षेत्रों में शुद्ध फसल से 20-25 क्विंटल/हेक्टेअर तक दाने की पैदावार प्राप्त की जा सकती है।